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वे इतने बेचैन क्यों हैं लाल किले पर होने वाले जनजातीय सांस्कृतिक समागम से

24 मई को दिल्ली के लालकिला मैदान में जुटेंगे 1.5 लाख जनजातीय प्रतिनिधि

गृहमंत्री अमित शाह के सानिध्य में लाल किले पर होगा जनजातीय समाज की सांस्कृतिक रक्षा के लिए ऐतिहासिक समागम

नई दिल्ली। भारत के सुदूर राज्यों में निवास करने वाले जनजातीय समाज को उसकी सांस्कृतिक विरासत से काटने और उसके धार्मिक मतांतरण के विरोध में विभिन्न जनजातियों के करीब 1.5 लाख लोग 24 मई को दिल्ली के लालकिला मैदान में जुटेंगे। जनजाति सुरक्षा मंच और जनजाति जागृति समिति द्वारा आयोजित इस “जनजातीय सांस्कृतिक समागम” के मुख्य अतिथि भारत के गृहमंत्री अमित शाह होंगे। अपनी तरह के इस विशेष आयोजन ने देश के अनेक सामाजिक संगठनों, ईसाई मिशनरियों सहित तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दलों में बेचैनी बढ़ा दी है। ऐसी सभी ताकतें जनजातीय समाजों के बीच इस आयोजन के बहिष्कार की अपील लगातार कर रही हैं। पर स्थानीय सूत्रों के अनुसार समस्या यह है कि उनकी कोई सुन नहीं रहा है।

सनातन बनाम सरना का भ्रामक नैरेटिव

भारत का जनजातीय समाज ब्रिटिश काल से ही निशाने पर रहा है। अंग्रेजों ने यह नैरेटिव स्थापित करने की भरसक कोशिश की कि भारत की जनजातियाँ यहां के सनातनी हिन्दू समाज और सभ्यता से अलग हैं। भारत को कमजोर करने वाले इस नैरेटिव को स्वतंत्रता के बाद कुचल दिया जाना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस, वामपंथ और ईसाई मिशनरियों का वह गठजोड़, जो अपने हित जनजातियों को हिन्दू सभ्यता से अलग दिखाने में आज भी देखता है, ऐसा नहीं कर सका।

इसीलिए आज भी यह गठजोड़ आदिवासियों को लगातार यह समझाने का प्रयास करता है कि जनजातीय लोग हिन्दू नहीं हैं। उनकी कोशिश है कि जनजातीय समाज की ऐसी राजनीतिक पहचान स्थापित कर दी जाए, जो सनातन हिन्दू समाज से पूरी तरह अलग दिखे। इससे उनका मतांतरण करना काफी आसान हो जाता है। इसी प्रयास में “सनातन बनाम सरना” का भ्रामक नैरेटिव खड़ा करने की कोशिशों में तेजी देखने को मिल रही है।

ईसाई जनजाति को आरक्षण क्यों?

जनजातीय सांस्कृतिक समागम का विरोध करने वालों का कहना है कि इस आयोजन के बहाने ऐसे जनजातीय लोग, जो ईसाई हो गए हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति सूची से हटाने के लिए यह राजनीतिक जमावड़ा किया जा रहा है। बड़ा प्रश्न यह है कि यदि ऐसा है भी, तो यदि किसी व्यक्ति या समाज ने अपने मूल देवी-देवता, पूजा-पद्धति, सामाजिक परंपराएँ, संस्कृति और शादी-विवाह के तरीके छोड़कर ईसाई क्रिया-विधियां और परंपराएँ अपना लीं, तो वे किस अर्थ में जनजातीय रह जाते हैं?

इसलिए ऐसे ईसाई जनजातीय लोगों की डीलिस्टिंग किया जाना मूल जनजातीय समाज के न्याय के हित में है। यह ईसाई विरोध का मामला बिल्कुल भी नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक, सभ्यतागत और संवैधानिक पहचान से जुड़ा मामला है। हिन्दू समाज से अलग करने के प्रयासों में जो संगठन “जनजाति” शब्द पर ही प्रश्नचिह्न लगाते हुए उसे हिन्दू समाज का निम्नतम घटक बताते नहीं थकते, उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या ऐसा करके वे भारतीय संविधान और उसके निर्माताओं का अपमान नहीं करते?

क्योंकि संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर ही “जनजाति” शब्द को संविधान में स्थान दिया था। इसीलिए समस्त वनवासी-गिरिवासियों को अनुसूचित जनजाति कहा जाता है। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार आरक्षण का लाभ जनजातीय पहचान के आधार पर लिया जा सकता है।

तो जब एक जनजाति का व्यक्ति ईसाई हो जाता है, तो उसी के साथ उसकी जनजातीय पहचान भी समाप्त हो जाती है। क्योंकि ईसाई मत के कठोर प्रतिबंधों के अनुसार वह अपनी जनजातीय धार्मिक परंपराओं का पालन नहीं कर सकता। यह बात और है कि उसे आरक्षण का लाभ लेने के लिए छद्म रूप से इसकी अनुमति दी जाती है।

ईसाई मत अपनाने की प्रक्रिया, जिसे बपतिस्मा कहा जाता है, ईसाइयत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है, जिसके माध्यम से मतांतरित व्यक्ति जीसस क्राइस्ट की शिक्षाओं से जुड़ता है। इसकी अनिवार्य शर्त यह है कि वह अपनी पूर्व धार्मिक शिक्षाओं को छोड़ता है। ऐसे में मतांतरित व्यक्ति या समाज स्वयं को जनजातीय कैसे कह सकता है?

भगवान बिरसा मुंडा का संघर्ष

यह एक प्रमुख प्रश्न है। इस समागम के माध्यम से जागृत जनजातीय समाज में ऐसे अनेक प्रश्न उठने लगेंगे। यही बात इस समागम के विरोधियों में बेचैनी पैदा कर रही है। वे नहीं चाहते कि “सरना-सनातन” एक होकर बड़ी ताकत बने। वे नहीं चाहते कि भारत की अटूट ऐतिहासिक-सांस्कृतिक एकता की निरंतरता बनी रहे।

इस विवाद में उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा को भी जबरदस्ती घसीट लिया है, जिनसे भारत में ईसाई साम्राज्य थर-थर कांपता था। वे भारत के ईसाईकरण के प्रबल विरोधी थे। उन्होंने “मुंडा विद्रोह” का नेतृत्व किया और जनजातीय अधिकारों तथा स्वशासन के लिए सशस्त्र संघर्ष किया था।

पूरी होगी आशा

भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने देश के विभिन्न राज्यों में जनजातीय समाज को आतंकित करने वाले नक्सलवादी आतंकवाद को अभियान चलाकर समाप्त किया है। अब वे इस समागम के मुख्य अतिथि हैं। देश के विभिन्न कोनों से 1.5 लाख लोग अपनी गुहार लेकर उनके पास आए हैं।

उनके सामने हिन्दू-जनजाति एकता और जनजातीय समाज के मतांतरण जैसा बड़ा मुद्दा नहीं उठेगा, इसकी संभावना कम ही है। यदि ऐसा हुआ, तो “डीलिस्टिंग” की मांग भी सामने आ सकती है। यह ठीक है कि यह आसान कार्य नहीं है, लेकिन वर्तमान मोदी सरकार ने जिस प्रकार गत वर्षों में अनेक ऐसे कार्य पूरे किए हैं, जो आसान नहीं थे, उससे सरना-सनातन की ऐतिहासिक एकता की निरंतरता के लिए प्रयासरत संगठनों में आशा का संचार हुआ है।

उन्हें उम्मीद है कि महान स्वतंत्रता सेनानी एवं जननायक भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष में आयोजित यह “जनजातीय सांस्कृतिक समागम” भारत में ईसाईकरण को रोकने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

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