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आगरा के जंगलों पर विलायती बबूल का कब्ज़ा, गायब हो रही हैं तितलियां और देशी हरियाली

तितलियां बचानी और बुलानी हैं तो देशी वृक्ष लगाने होंगे - पर्यावरणविद अधिवक्ता के.सी. जैन

स्थानीय पेड़ नहीं बचेंगे तो जैव विविधता भी समाप्त हो जाएगी — पालीवाल पार्क में गूंजा संदेश

आगरा। जिस समाज को अपने पेड़ों, पौधों और झाड़ियों की पहचान नहीं होती, वह धीरे-धीरे अपनी जैव विविधता, प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरणीय संतुलन – तीनों खो देता है।

इसी गम्भीर चिंता के साथ आज पालीवाल पार्क में प्रातःकालीन भ्रमणकारियों के दल की बैठक आयोजित हुई, जिसमें पर्यावरण प्रेमी अधिवक्ता के.सी. जैन ने आगरा की तेजी से बदलती हरियाली और स्थानीय प्रजातियों के लुप्त होने पर विस्तार से विचार रखे। चर्चा के दौरान यह बात प्रमुखता से सामने आयी कि जब तक समाज जैव विविधता को समझेगा नहीं, तब तक उसका संरक्षण और संवर्धन दोनों असम्भव रहेंगे। अधिवक्ता जैन ने कहा कि आज सामान्य रूप से लोगों के बीच वृक्षों और पौधों के प्रति भारी अज्ञानता है। अधिकांश लोग केवल सजावटी पौधों तक सीमित हो गए हैं, जबकि स्थानीय पारिस्थितिकी को सहारा देने वाले पारंपरिक देशी वृक्ष तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि आगरा के जंगल आज “विलायती बबूल” के एकतरफा कब्जे में आते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि चाहे मऊ के जंगल हों, कीठम क्षेत्र हो, बाह क्षेत्र हो या ताज नेचर वॉक – लगभग हर स्थान पर विलायती बबूल का अत्यधिक विस्तार दिखाई देता है। इस विदेशी प्रजाति के कारण स्थानीय वृक्षों, झाड़ियों और घासों को बढ़ने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। परिणामस्वरूप जंगलों की प्राकृतिक विविधता समाप्त होती जा रही है।

उन्होंने भावुक शब्दों में कहा कि आज के जंगलों में न पहले जैसी तितलियां दिखाई देती हैं, न चिड़ियों के घोंसले, न मधुमक्खियों की चहल-पहल और न ही वह प्राकृतिक जीवन, जो कभी आगरा की पहचान हुआ करता था। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि वे पक्षियों, कीटों, तितलियों, जीव-जंतुओं और सूक्ष्म जीवों का पूरा संसार होते हैं। यदि उसमें केवल एक ही विदेशी प्रजाति छा जाए तो पूरा पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित हो जाता है।

अधिवक्ता जैन ने बताया कि आगरा जैसे क्षेत्र में स्थानीय कांटेदार वृक्ष अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है और वे भीषण गर्मी में भी जीवित रहते हैं। उन्होंने स्थानीय प्रजातियों में तमाल, केंथ, रेमजा, शमी, बेलपत्र, हिंगोट और बेर जैसे वृक्षों का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ये वृक्ष केवल पर्यावरण के लिये ही नहीं बल्कि पक्षियों और छोटे जीवों के लिए भी आश्रय प्रदान करते हैं।

बिना कांटों वाले स्थानीय वृक्षों में अर्जुन, कदम्ब, सहजन, शहतूत, इमली, जामुन, वरना, अमलतास, अंकोल और सिरस को उन्होंने अत्यंत उपयोगी बताया। इन वृक्षों की विशेषता यह है कि ये कम पानी में भी विकसित हो जाते हैं और छाया, ऑक्सीजन तथा जैव विविधता – तीनों प्रदान करते हैं।

फाइकस प्रजाति के वृक्षों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि गूलर, पीपल, बरगद और पाखड़ जैसे वृक्ष प्रकृति के “जीवनदाता” हैं। इन पर बड़ी संख्या में पक्षी, तितलियां और अन्य जीव निर्भर रहते हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी क्षेत्र में फाइकस प्रजाति के वृक्ष अधिक हों तो वहां जैव विविधता स्वतः बढ़ने लगती है।

स्थानीय झाड़ियों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने अडूसा, वज्रदंती, करील और हिंस जैसी प्रजातियों को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि जंगल केवल बड़े वृक्षों से नहीं बनते, बल्कि झाड़ियां, घास और छोटे पौधे भी पारिस्थितिकी का अभिन्न हिस्सा होते हैं।

बैठक में उपस्थित लोगों को यह जानकर विशेष आश्चर्य हुआ कि तितलियां अपने अंडे केवल विशेष प्रकार के पेड़ों और झाड़ियों पर ही देती हैं। उनके लार्वा उन्हीं पौधों की पत्तियां खाकर जीवित रहते हैं। यदि किसी क्षेत्र में उनकी पसंद के पौधे नहीं होंगे, तो तितलियां वहां कभी नहीं आएंगी।

अधिवक्ता जैन ने कहा कि आज लोग “बटरफ्लाई पार्क” बनाने की बात तो करते हैं, लेकिन तितलियों के लिये आवश्यक स्थानीय पौधे लगाने पर ध्यान नहीं देते। यदि वास्तव में तितलियों को वापस लाना है तो हमें स्थानीय वृक्षों और झाड़ियों की विविधता बढ़ानी होगी। तभी प्राकृतिक रूप से तितलियां, पक्षी और अन्य जीव वापस लौटेंगे।

उन्होंने आगरा के लिए जारूल, कुसुम और वरना जैसे शोभाकार वृक्षों को भी अत्यंत उपयुक्त बताया। उन्होंने कहा कि ये वृक्ष न केवल सुंदर पुष्प देते हैं बल्कि शहर को रंग, खुशबू और प्राकृतिक आकर्षण भी प्रदान करते हैं। यदि इनका बड़े स्तर पर रोपण किया जाए तो आगरा की सड़कों और पार्कों की सुंदरता कई गुना बढ़ सकती है।

अधिवक्ता जैन ने सुझाव दिया कि समय-समय पर बच्चों को पार्कों और हरित क्षेत्रों में ले जाकर वृक्षों और जैव विविधता के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को यदि प्रकृति से जोड़ा नहीं गया तो भविष्य में पर्यावरण संरक्षण केवल पुस्तकों तक सीमित रह जाएगा।

बैठक के अंत में उपस्थित सभी प्रातःकालीन भ्रमणकारियों ने आगामी वर्षा ऋतु में अधिक से अधिक स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष लगाने का संकल्प लिया तथा यह निर्णय लिया कि लोगों के बीच जैव विविधता और देशी वृक्षों के महत्व को लेकर जागरूकता अभियान भी चलाया जाएगा।

वार्ता में अनिल अग्रवाल, डॉ. संजीव गोयल सहित अनेक पर्यावरण प्रेमी एवं प्रातःकालीन भ्रमणकारी उपस्थित रहे।

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