एटा। उत्तर प्रदेश के एटा जनपद के मिरहची क्षेत्र स्थित अचलपुर गाँव का अतरंजीखेड़ा प्राचीन भारतीय लौह तकनीक के विकास केंद्र तथा बौद्ध संस्कृति के महत्वपूर्ण स्थलों में से एक माना जाता है। इस स्थान के महत्व को इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और आम जनता के बीच लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से भारतीय इतिहास संकलन समिति, ब्रज प्रांत की एटा इकाई द्वारा आज जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय था — “अतरंजीखेड़ा : भारतीय तकनीक एवं बौद्ध संस्कृति का प्राचीन केंद्र”।
संगठन मंत्री संजय ने कहा
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि भारतीय इतिहास संकलन समिति के अखिल भारतीय सह-संगठन मंत्री संजय ने कहा कि भारतीय ज्ञान और कौशल के अनेक केंद्र आज उपेक्षा के शिकार हैं, जबकि प्रत्येक भारतीय को उन पर गर्व होना चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के एटा जनपद का अतरंजीखेड़ा भारत की प्राचीन तकनीक और बौद्ध संस्कृति से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल है, जिसके पुरातात्विक प्रमाण भी उपलब्ध हैं। इसे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, ताकि छात्र एवं पर्यटक भारत की गौरवशाली तकनीकी और बौद्ध परंपराओं से परिचित हो सकें।
अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) सुगम आनंद ने कहा
समिति के ब्रज प्रांत अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) सुगम आनंद ने कहा कि अतरंजीखेड़ा भारत के उन प्रारंभिक स्थलों में से एक है, जहाँ लोहे के औजार, कृषि उपकरण, हथियार तथा धातु गलाने की भट्टियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये खोजें स्पष्ट करती हैं कि यहाँ के लोग उत्कृष्ट लौह निर्माण और धातुकर्म में पारंगत थे, जिससे आगे चलकर राज्यों और शहरी सभ्यताओं के विकास को गति मिली।
उन्होंने बताया कि अब यह प्रमाणित हो चुका है कि भगवान बुद्ध ने यहाँ स्थित बैरंजा नगर के एक टीले पर अपना 12वाँ वर्षावास किया था। उस समय राजा बेन अतरंजीखेड़ा के शासक थे और उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था। भगवान बुद्ध के वर्षावास से प्रभावित होकर उन्होंने ही यहाँ ‘बेरंजा’ नामक नगर की स्थापना की थी। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘मंगलम’ में इसका उल्लेख किया है।
ब्रज प्रांत महामंत्री डॉ. तरुण शर्मा ने कहा
ब्रज प्रांत महामंत्री डॉ. तरुण शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार ने अतरंजीखेड़ा को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने हेतु इसे बौद्ध सर्किट से जोड़ा था। इसके बावजूद यहाँ केवल चारदीवारी बनाकर कार्य अधूरा छोड़ दिया गया। इस स्थल के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए।
उन्होंने कहा कि यह विडंबना है कि सरकार की “एक जिला, एक पर्यटन केंद्र” योजना के बावजूद अतरंजीखेड़ा आज भी उपेक्षा का शिकार है। इसके कारण आम भारतीय अपने गौरवशाली अतीत से परिचित नहीं हो पा रहे हैं। डॉ. शर्मा ने राज्य सरकार से मांग की कि अतरंजीखेड़ा को प्राथमिकता के आधार पर विकसित किया जाए।
संगोष्ठी में समिति के प्रांत कोषाध्यक्ष नवीन, कासगंज से आए प्रधानाचार्य अशोक गुप्ता, जीआईसी आगरा के प्रधानाचार्य मानवेंद्र सिंह तथा आगरा से आए आचार्य सुनील चौधरी और आचार्य भूपेंद्र कुमार राघव सहित अनेक इतिहासविद उपस्थित रहे।






